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Notes from the field · ज़मीन से

प्रोजेक्ट खत्म हो जाए, पर उद्यम चलता रहे

ग्रामीण आजीविका के उद्यम फंडिंग खत्म होते ही क्यों ठप पड़ जाते हैं, और MUKTA CONSULTANCY इस कहानी को कैसे बदलना चाहती है।

MUKTA CONSULTANCY31 अक्टूबर 2026पढ़ने का समय: लगभग 8 मिनट

भूमिकाएक सवाल, जो बार-बार सामने आता है

ग्रामीण विकास और आजीविका के क्षेत्र में काम करते हुए हमने गाँव-गाँव में एक ही दृश्य कई बार देखा है: कहीं चमकदार बोर्ड लगा एक शेड, जिसमें अब कोई गतिविधि नहीं होती; कहीं मशीनें, जिन पर धूल जम चुकी है; और फ़ाइलों में दर्ज एक "सफल प्रोजेक्ट", जो ज़मीन पर कहीं दिखाई नहीं देता।

सवाल यह है कि जब नीयत अच्छी थी, पैसा लगा, ढाँचा बना, तो फिर उद्यम टिका क्यों नहीं? यह लेख इसी सवाल से शुरू होता है, और उस रास्ते पर खत्म होता है जिस पर चलकर हम ऐसे उद्यम खड़े करना चाहते हैं जो प्रोजेक्ट खत्म होने के बाद भी आत्मनिर्भर और टिकाऊ रहें।

01फंडिंग खत्म, काम खत्म

ग्रामीण विकास और आजीविका के काम में कई एजेंसियाँ सक्रिय हैं। प्रोजेक्ट आते हैं, फंडिंग आती है, और जब तक फंडिंग रहती है, तब तक काम चलता रहता है। लेकिन फंडिंग खत्म होते ही तस्वीर बदल जाती है। जो इन्फ्रास्ट्रक्चर बना था, वह धीरे-धीरे खंडहर में बदलने लगता है, और जिस मकसद से इकाइयाँ बनाई गई थीं, वह मकसद अधूरा रह जाता है।

फ़ाइलों में पहली बार की सफलता दर्ज हो जाती है, पर अगले चक्र में वही इकाई बंद मिलती है। हमने खुद कई जगह जाकर यह देखा है: अलग-अलग योजनाओं के तहत बने सामुदायिक शेड, पशुधन केंद्र और ग्रामीण उत्पादन इकाइयाँ, जो योजना की प्राथमिकताएँ बदलने के बाद आज खाली और बंद पड़ी हैं।

यह किसी एक सरकार, दल या विभाग की बात नहीं है। अलग-अलग समय पर, अलग-अलग योजनाओं में यही कहानी दोहराई गई है। कमी योजनाओं की नीयत में नहीं थी। कमी इस बात में थी कि उद्यम को समुदाय के स्वामित्व और बाज़ार की ताकत पर खड़ा नहीं किया गया, बल्कि सिर्फ़ योजना के सहारे छोड़ दिया गया।

जो उद्यम सिर्फ़ बाहरी फंडिंग या किसी योजना के सहारे खड़ा होता है, वह उस सहारे के हटते ही गिर जाता है।

02अच्छे इरादे, पर स्वामित्व और बिज़नेस समझ की कमी

यह कहना भी गलत होगा कि प्रयास नहीं हुए। प्रशासन ने अपनी तरफ़ से काफ़ी अच्छा काम किया है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) की कई गतिविधियाँ हमने ज़मीन पर देखी हैं, खासकर पशुपालन के क्षेत्र में, चाहे बकरी पालन हो, मुर्गी पालन हो या डेयरी।

लेकिन ज़्यादातर गतिविधियों में लोन पर निर्भरता बनी रहती है। एक साल काम अच्छा चलता है, फिर वह ठहर जाता है। हमने अलग-अलग ज़िलों में ऐसे कई लेयर फ़ार्म देखे हैं, जो बहुत अच्छे बने थे। उन पर कुल मिलाकर करोड़ों रुपये खर्च हुए, लाखों रुपये का सेटअप बना और लाखों रुपये वर्किंग कैपिटल में लगे। फिर भी काम बिगड़ गया, क्योंकि:

03हमारा रास्ता: पहले जाँच, फिर शुरुआत

MUKTA CONSULTANCY की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि हम वही प्रोजेक्ट हाथ में लेते हैं, जो हमारी जाँच में टिकाऊ साबित होता है, और फिर सफलता तक उसके साथ रहते हैं। अवधारणा बनाते समय हम पहले सैद्धांतिक रूप से देखते हैं कि प्रोजेक्ट कितना टिकाऊ है, और उसके बाद एक विस्तृत सामाजिक-तकनीकी-व्यावसायिक (socio-techno-commercial) व्यवहार्यता अध्ययन करते हैं।

सामाजिकलोग और समाजइलाके की सामाजिक संरचना और संस्कृति कैसी है? क्या लोग इस प्रोजेक्ट को अपनाएँगे? इसके उत्पादों से कोई सामाजिक तनाव तो नहीं होगा? लोगों की सोच और रुचि क्या है?
तकनीकीज़मीन और संसाधनक्या यह वहाँ की दीदियों या उद्यमी के लिए तकनीकी रूप से संभव है? बारहमासी सड़क, बिजली, पानी, स्थानीय कच्चा माल, परिवहन, निर्माण, भूगोल, पर्यावरण और मौसम।
व्यावसायिकबाज़ार और लागतबाज़ार सर्वे, उत्पादन लागत बनाम स्थानीय बाज़ार भाव, और यह सुनिश्चित करना कि compliance से जुड़ी कोई रुकावट न हो।

मौसम की जाँच हम खास तौर पर करते हैं। अलग-अलग मौसमों की रिपोर्ट देखकर यह परखते हैं कि वहाँ की सर्दी, गर्मी और बरसात उस खेती या पशुधन के लिए उपयुक्त है या नहीं। साथ ही यह भी देखते हैं कि कहीं हमारी उत्पादन लागत स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री से ज़्यादा तो नहीं जा रही।

यह एक दिन का काम नहीं है। इसमें 15 से 30 दिन लगते हैं, और इस दौरान हम बार-बार लोगों के बीच जाते हैं। यह अध्ययन दफ़्तर में बैठकर नहीं, गाँव में बैठकर होता है।

04स्वामित्व: कोई इंजेक्शन नहीं, लंबा साथ

स्वामित्व की भावना विकसित करने का कोई टीका या दवाई नहीं है, कि बाज़ार से लाकर एक इंजेक्शन लगा दिया और किसी महिला में अपने उद्यम के लिए स्वामित्व का भाव आ गया। यह भाव तभी आता है जब हम लगातार उसके साथ जुड़े रहें।

इसीलिए सबसे पहले हमारी अपनी टीम "pseudo-owner" बनती है, यानी उद्यम को ऐसे अपनाती है जैसे वह उसका अपना हो। जब तक हमारे भीतर स्वामित्व का भाव नहीं होगा, हम दूसरों में उसे नहीं जगा सकते।

हमारा बदलाव का मॉडल तीन पड़ावों से गुज़रता है:

पड़ाव 1हितग्राहीजिसे योजना का लाभ मिलता है।
पड़ाव 2उत्पादकतकनीकी और उत्पादन प्रशिक्षण से वह उत्पादन करने लगती है।
पड़ाव 3मालिक-सदस्य और उद्यमीनेतृत्व, बिज़नेस समझ और उद्यमिता के लगातार प्रशिक्षण से वह उद्यम की मालिक बनती है।

यह वही प्रक्रिया है जिससे कोई बात हमारे चेतन मन (conscious) से अवचेतन मन (subconscious) तक पहुँचती है। इसे तीन चरणों में समझा जा सकता है:

Knowingजाननाकिसी चीज़ के बारे में जानना। पर जानने का मतलब यह नहीं कि आप उसे कर भी सकते हैं।
Doingकरनाएक-दो बार अभ्यास करने से तकनीकी ज्ञान आता है और आप वह काम करने में सक्षम होते हैं।
Beingहोनाकाम करते-करते उसमें इतना रम जाना कि वह अवचेतन में बस जाए।
जब तक किसी सदस्य में "Being" का चरण नहीं आता, चाहे वह SHG की दीदी हो या कोई अकेला उद्यमी, तब तक उद्यम सफल नहीं हो सकता। स्वामित्व ऐसे ही आता है।

05क्लासरूम नहीं, "ह्यूमन लैब"

हमारे प्रशिक्षण में सिर्फ़ तकनीकी ज्ञान या हिसाब-किताब नहीं होता। इसके साथ हम नेतृत्व कौशल (leadership skilling) और मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण भी देते हैं।

क्लासरूम ट्रेनिंग हर किसी को समझ में नहीं आती। इसलिए हम छोटे-छोटे learning programs, demonstration, फ़ील्ड गतिविधियों और खेलों के माध्यम से सिखाते हैं। इसे हम "ह्यूमन लैब" कहते हैं, जहाँ दीदियाँ करके सीखती हैं:

06हर कदम पर प्लान B

नुकसान या विफलता की आशंका को हम नज़रअंदाज़ नहीं करते। हर चरण पर हमारा एक प्लान B, यानी backup योजना, तैयार रहता है। अगर कहीं नुकसान हो जाए या कोई कदम सफल न हो, तो हम वैकल्पिक रास्ता पहले से देखकर रखते हैं। यह सीखने और सुधारने (trial and error) पर आधारित व्यवस्था है, जिसमें हम अपनी तरफ़ से हर स्थिति के लिए सक्षम रहने की कोशिश करते हैं।

07धीरे-धीरे साथ छोड़ना: हमारा Exit Plan

हमारा exit plan ऐसा नहीं होता कि 3 साल का प्रोजेक्ट लिया और 3 साल बाद, चाहे सफल हो या न हो, हम चल दिए। किसी भी गतिविधि, चाहे खेती हो, पशुपालन हो या कोई छोटा विनिर्माण सेटअप, को चलाने के लिए कम से कम एक पूरा चक्र, यानी सर्दी, गर्मी और बरसात, साथ बिताना ज़रूरी है। हमारा साथ इस तरह धीरे-धीरे कम होता है:

  1. पहला चक्र
  2. एक दिन छोड़कर
  3. हफ़्ते में 2 बार
  4. हफ़्ते में 1 बार
  5. 15 दिन में 1 बार
  6. महीने में 2–3 बार

पहले चक्र में हम 24×7 उस दीदी या उद्यमी का हाथ थामे रहते हैं। जब तक वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता और पूरी तरह आत्मविश्वासी नहीं हो जाता, हम साथ नहीं छोड़ते। जब हमें लगता है कि सामान्य परिस्थितियों में उद्यम अच्छे से चलता रहेगा और हर चीज़ व्यवहार्य हो गई है, तभी हम धीरे से हाथ छोड़ते हैं। अगर बाज़ार या उत्पादन में कोई बड़ा बदलाव या संकट आए, तो उसके लिए भी हम तैयार रहते हैं।

अंत मेंप्रोजेक्ट की सफलता, फ़ाइल में नहीं, गाँव में

हमारे लिए किसी प्रोजेक्ट की असली सफलता वह दिन है, जब फंडिंग खत्म हो चुकी हो, हमारी टीम लौट चुकी हो, और फिर भी गाँव में वह उद्यम चल रहा हो। उसे चलाने वाली दीदी अब हितग्राही नहीं, बल्कि अपने उद्यम की मालिक हो।

अगर आप भी ऐसा उद्यम खड़ा करना चाहते हैं जो प्रोजेक्ट के बाद भी चले, तो हमसे बात करें।

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इस लेख में बताए गए अनुभव लेखक के ज़मीनी अवलोकन पर आधारित हैं। किसी संस्था, अधिकारी या व्यक्ति की आलोचना इसका उद्देश्य नहीं है।